Thursday, March 21, 2019

गज़ब आंटियाँ

आंटी 1 -   हाथ देकर आंटी ने रिक्शा रकवाया। आवाज़ बिलकुल पतली। उम्र 58-60 के लगभग। आंटी जी ने पिंक और ग्रे रंग का गर्म सूट पहना था। मासूम चेहरा उस पर रंग दूध-सा गोरा। सूट के रंग से मिलती हल्की पिंक लिपस्टिक और बिन्दी, आँखों में काजल लगाए हुए। मेरा ध्यान उनके बालों और पर्स पर ही अटक गया। हाथ में चमकता गोल्डन पर्स और माथे तक आईं लेज़र कट की लटें उन पर ख़ूब जँच रही थीं। उन्हें देखकर लग रहा था कि वे ज़िंदगी को लेकर बहुत सक्रिय हैं और अपने हिसाब से जीना जानती हैं। जाने क्यों उनमें मुझे गुज़रे ज़माने की प्रसिद्ध नायिका साधना की छवि दिखाई दी। नवंबर का महीना और शाम का समय होने से हवा ठंडी हो चली थी। आंटी जी दोनों हाथ बाँधकर सिकुड़कर बैठ गईं, फिर मेरी ओर देखकर बोली पैदल चलने पर इतनी ठंड नहीं लगती, जितनी रिक्शे में सीधी हवा लगने से लगती है पर मौसम अच्छा हो गया है। मैंने हाँ में सिर हिला दिया। फिर मुझसे पूछा कि मैं कहाँ जाऊँगी और बताया कि उन्हें शुगर है। कल टेस्ट करवाया था, उसी की रिपोर्ट लेने जा रही हैं। इसी बहाने उनका घर से निकलना भी हो जाता है। फिर वे ठंडी हवा का आनंद लेने लगी। मुझे आंटी जी का व्यक्तित्व और उनकी चपलता दोनों बहुत आकर्षक लगे। wow से बढ़कर अगर कुछ होता है तो वही।

आंटी 2 - नई दिल्ली मैट्रो स्टेशन से आंटी जी ने अपने नाती (उम्र 16-17 वर्ष के आसपास) के साथ मैट्रो के पहले कोच में प्रवेश किया। सारी सीटों पर महिलाएँ और लड़कियाँ बैठी थीं, केवल एक ही सीट खाली थी। आंटी जी उस पर बैठ गई। लड़का खड़ा था। शायद उसे अब तक यह अहसास नहीं हुआ था कि वह महिलाओं के लिए आरक्षित मैट्रो के पहले कोच में है। आंटी जी के साथ वाली सीट पर बैठी लड़की ने उसे कहा कि वह दूसरे कोच में चला जाए। तब लड़के ने अपने चारों ओर नज़र घुमाई और आंटी जी से बोला कि वह साथ वाले कोच में जा रहा है, वहाँ से उन्हें देखता रहेगा। आंटी जी ने देखा कि वहाँ सीट खाली नहीं है, फिर बोली कि खड़ा तो वहाँ भी रहेगा तो जाकर क्या करेगा। अगले स्टेशन पर मैट्रो की एक महिला कर्मचारी आई और लड़के को दूसरे कोच में जाने के लिए कहा। वह बेचारा जाने ही लगा था कि आंटी जी ने उसका हाथ पकड़कर रोक लिया और सामने बैठे एक बच्चे की ओर संकेत करते हुए बोली कि वह भी तो लड़का है। कर्मचारी बोली, अरे! माताजी वह 12 वर्ष से छोटा है। छोटे लड़के बैठ सकते हैं। आंटी जी अपने नाती की ओर देखकर बोली कि यह कौन सा बड़ा है, 15 का तो है। तब मैट्रो कर्मचारी सख्ती दिखाते हुए बोली कि 200 रु जुर्माना देना पड़ेगा। आंटी ने उसे घूरकर देखा और लड़का थैला उठाकर जाने को हुआ। मैट्रो कर्मचारी के बाहर जाते ही गेट बंद हो गया और आंटी जी ने लड़के को जाने से रोक लिया। अगले स्टेशन पर फिर वही किस्सा। आंटी जी का समय प्रबंधन गज़ब का था। वह मैट्रो कर्मचारी को गेट खुले रहने तक बहस में उलझाए रखती, फिर लड़के को जाने का संकेत करती और बाद में रोक लेती। उन्होंने चार बार ऐसा किया। पाँचवें स्टेशन के आते ही चली गई। लड़का हर बार यही कहता कि क्या नानी आप भी। आसपास बैठी सभी महिलाएँ उनकी चालाकी समझ गई थीं। जब तक वे रहीं, मेरे मन में भी यही चल रहा था-क्या आंटी जी आप भी।

Saturday, March 16, 2019

बस यूँ ही

स्टेशन पर मैट्रो का गेट खुला है। एक महिला, उसका 10-11वर्ष का बेटा, बेटी (शायद दो वर्ष की है) और सास आए। मेरी साथ वाली सीट खाली थी, वहाँ सास आंटी जी, जिन्होंने गुलाबी रंग का सूट पहना है, उन्हें बैठाया गया। जैसे ही सामने वाली सीट खाली हुई उस पर बेटा बैठने लगा तो महिला ने कहा कि मैं बैठ जाती हूँ, तुम दूसरे कोच में सीट खाली है, वहाँ चले जाओ। लड़के की हरकतों से लग रहा है कि वह शांत रहने वालों में से नहीं हैं। वह जल्दी से उस सीट तक पहुँचा पर तब तक उस पर एक लड़की बैठ चुकी है। वह वापस आ गया, मुँह बनाकर माँ से कह रहा है कि मुझे कोल्ड ड्रिंक पीनी है। उन्होंने कहा थोड़ी तसल्ली रख और थोड़ा आगे खिसककर उसे बैठने के लिए कहा पर वह नहीं बैठा और मैट्रो में लगे खंभे पर लटककर झूल रहा है। अच्छा हुआ जो इसी समय एक सीट खाली हो गई और लड़का उस पर बैठ गया। थोड़ी जगह उसने अपनी छोटी बहन को भी दे दी है। यहीं से मैंने अपनी नजरें उन पर गढ़ा लीं। आगे की कहानी इस प्रकार है कि महिला ने नीले बेस रंग पर पीले डॉट्स वाला सूट पहना है। मेकअप के नाम पर केवल एक बिंदी और माँग में सिंदूर है। रंग गोरा, वैसे तो चारों का ही रंग गोरा है। महिला देखने में बहुत प्यारी और सुंदर लग रही है बिल्कुल अपनी बेटी की तरह और वह लड़का उधम कर रहा है। तभी सास आंटी जी ने ज़ोर से लगभग मेरे कान के पास चिल्लाते हुए स्टेशन का नाम लिया। मैंने अपना ध्यान वापस सामने की सीट पर लगा लिया है। हाँ तो उस लड़के ने प्लास्टिक के थैले में से एक मिनी कोल्ड ड्रिंक की बोतल निकाली और चिप्स का पैकेट लेकर शुरू हो गया। माँ ने उसे ढक्कन नीचे फेंकने के लिए मना किया और इशारे से थैले में डालने को कहा (मैट्रो में ही सही पर आम लोगों का यह व्यवहार मुझे ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की याद दिला देता है)। दूसरी ओर सास आंटी जी ने फिर ज़ोर से चिल्लाते हुए स्टेशन का नाम लेकर मेरा ध्यान भंग कर दिया। मैंने उनकी ओर देखकर मुँह बना लिया। वैसे तो लड़के के रंग-ढंग मुझे अच्छे नहीं लगे पर वह चिप्स के कुछ टुकड़े अपने हाथ से बहन को भी खिला रहा है, जो मुझे अच्छा लगा। उस प्यारी सी बच्ची ने तोतली आवाज़ में कुछ कहा, जो मुझे समझ तो नहीं आया पर उसकी माँ को आ गया है। वह हँस रही है पर मेरी नज़र उसके चेहरे पर अटक गई है कि कोई बिना मेकअप के इतना सुंदर कैसे दिख सकता है। कुछ तो गड़बड़ है। हाँ, सामने के दो दाँत गायब हैं, दो नहीं तीन। शायद टूट गए हैं। मैं अनुमान लगाने ही लगी थी कि दाँत कैसे टूटे होंगे कि वह फिर ज़ोर से हँसी। इस बार मैंने अपनी जासूसी आँखें उसके मसूड़े में गढ़ा दी। मेरा अनुमान गलत निकला कि उसके दाँत टूट गए हैं। वे टूटे नहीं बल्कि पूरी तरह से निकले नहीं हैं, जैसे कि बाकी दाँत। मसूड़े के नीचे छोटे-छोटे दाँत हैं, जो उसके हँसने पर ही दिखते हैं, बोलने पर नहीं। सास आँटी जी ने फिर से मेरा ध्यान भटका दिया है। गेट से एक दक्षिण भारतीय महिला आई और लड़के के साथ वाली सीट पर बैठ गई है। यह महिला अकसर मुझे मैट्रो में दिखती रहती है। वह भी उस बच्ची से बात करने की कोशिश कर रही है। बच्ची एकटक उसे देख रही है फिर अपनी माँ की ओर देखकर तुतलाते हुए कुछ बोली। मुझे इस बार भी समझ नहीं आया कि वह क्या बोली। दोनों अति सुंदर महिलाएँ उसकी बात पर हँस रही हैं। मैं उन्हें ध्यान से देख रही हूँ। कुछ तो गड़बड़ झाला है। अरे! इस महिला के भी दाँत। सामने से बायीं ओर के दो, हाँ पक्का दो दाँत टूट गए हैं और ये टूटे ही हैं क्योंकि मुझे उसके मसूड़े में कोई दंतीय अवशेष दिखाई नहीं दे रहा है। संयोग देखिये कि इस महिला को तो मैं अकसर देखती रहती हूँ पर इतने ध्यान से कभी नहीं देखा। सास आंटी जी ने इस बार स्टेशन का नाम लेते हुए अपना दायाँ हाथ भी ज़ोर से हिलाया, जो सीधा मेरे बालों पर आकर लगा है। लग रहा है कि बाल फिर से बनाने पड़ेंगे। बहरहाल इस बार चार लड़कियों ने मैट्रो में प्रवेश किया। तीन लड़कियाँ मोबाईल में लगी हैं और एक ने मुँह पर मास्क पहना है। मास्क पहनने का कारण दिल्ली का प्रदूषण हो सकता है या उसका अपना कोई निजी मेजिकल कारण भी या फिर टशन भी। जो भी हो मुझे किसी के दाँत दिखाई नहीं दे रहे हैं। सास आंटी जी को तो आप जान ही चुके हैं, मैं उनके हिलने से पहले ही उठ गई हूँ। मेरा स्टेशन आ गया है। जाते हुए एक बात और उस लड़की का मास्क बहुत सुंदर है। सफ़ेद रंग पर पीली तितलियाँ खिल रही हैं। मैंने ऐसा मास्क पहले कभी नहीं देखा।